मनरेगा में बड़ा खेल: बलुआ चौबे ग्राम पंचायत में धरातल पर काम नहीं, ऑनलाइन फर्जी हाजिरी का गंभीर आरोप
बलुआ चौबे के ग्रामीणों की यह सुगबुगाहट अब एक बड़ी चेतावनी बन चुकी है। आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग इस मामले को महज एक स्थानीय शिकायत मानकर ठंडे बस्ते में न डाले।
अजीत मिश्रा (खोजी)
मनरेगा में भ्रष्टाचार: कागजों पर दौड़ रहे मजदूर, धरातल पर सन्नाटा— आखिर कब तक चलेगा यह खेल?
- विकास खंड गौर के चकबंध निर्माण में भ्रष्टाचार की बू: कागजों पर दौड़ रहे मजदूर, धरातल पर पसरा सन्नाटा
- डिजिटल अटेंडेंस (NMMS) प्रणाली को ठेंगा: बिना काम किए ऑनलाइन हाजिरी दर्ज होने से ग्रामीणों में भारी आक्रोश
- मजदूरों के हक पर डाका: ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक और ब्लॉक कर्मियों की मिलीभगत से सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका
- जिला प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग: मास्टर रोल, जियो-टैगिंग और भुगतान अभिलेखों के मिलान पर टिकी ग्रामीणों की नजरें
गरीबों के हाथ में रोजगार, समय पर मजदूरी और गांवों का विकास— महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का यह मूल मंत्र आज कागजों की स्याही में दम तोड़ता नजर आ रहा है। बस्ती जिले के विकास खंड गौर के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बलुआ चौबे से सामने आया मामला इस बात का जीता-जाता प्रमाण है कि कैसे सरकारी योजनाओं की आड़ में बंदरबांट का खेल बेखौफ जारी है। ‘दक्षिण टोला गांव से जोगी के चक तक चकबंध निर्माण कार्य’ के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मेहनतकश मजदूरों के हक पर डाका है।
धरातल पर सन्नाटा, ऑनलाइन अटेंडेंस की मायावी दुनिया
एक तरफ सरकार पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) जैसी डिजिटल व्यवस्थाओं का ढिंढोरा पीटती है, वहीं बलुआ चौबे ग्राम पंचायत ने इन तकनीकी सुरक्षा चक्रों को भी मजाक बनाकर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि जब धरातल पर झांकने पर एक भी मजदूर काम करता नजर नहीं आता, तब भी डिजिटल मास्टर रोल पर ऑनलाइन हाजिरी की मशीनें धड़ल्ले से अटेंडेंस दर्ज कर रही हैं।
यह कौन सा जादुई विकास है, जहाँ मजदूर घर बैठे हैं और उनके नाम पर हाजिरी का पहिया तेजी से घूम रहा है? क्या यह तकनीक का दुरुपयोग है या फिर मिलीभगत का एक नया और सुरक्षित तरीका?
मिलीभगत का गठजोड़ और जवाबदेही से दूरी
ग्राम पंचायतों में चलने वाले इन फर्जीवाड़ों के पीछे अक्सर एक मजबूत सांठगांठ काम करती है। स्थानीय ग्रामीणों के गंभीर आरोप हैं कि इस पूरे खेल में ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक और ब्लॉक स्तर के जिम्मेदार कर्मचारियों की सीधी संलिप्तता है। सवाल यह उठता है कि जब ग्रामीण चीख-चीखकर भ्रष्टाचार के इन प्रमाणों को सामने ला रहे हैं, तो संबंधित ब्लॉक के अधिकारी आंखों पर पट्टी बांधकर क्यों बैठे हैं? क्या क्षेत्र के तकनीकी सहायकों और अवर अभियंता (JE) ने कभी मौके पर जाकर मुआयना करने की जहमत उठाई, या फिर कागजी खानापूर्ति को ही विकास मान लिया गया?
मजदूरों के पसीने की कीमत पर डाका
मनरेगा योजना उन परिवारों के लिए जीवन रेखा है, जिनके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं होता। जब ऐसे जरूरतमंदों को रोजगार से वंचित कर, फर्जी नामों से सरकारी खजाने को चूना लगाया जाता है, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि एक सामाजिक अपराध है। गरीब का पसीना और हक जब बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ जाता है, तो सिस्टम पर से जनता का भरोसा डगमगाने लगता है।
जिला प्रशासन से आर-पार की मांग
बलुआ चौबे के ग्रामीणों की यह सुगबुगाहट अब एक बड़ी चेतावनी बन चुकी है। आवश्यकता इस बात की है कि जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग इस मामले को महज एक स्थानीय शिकायत मानकर ठंडे बस्ते में न डाले।
हमारी मांग है कि:
- तत्काल स्वतंत्र जांच टीम गठित हो: कार्यस्थल की भौतिक स्थिति, ऑनलाइन हाजिरी और जियो-टैगिंग की सत्यता की उच्चस्तरीय जांच हो।
- अभिलेखों का मिलान: पिछले मास्टर रोल, भौतिक उपस्थिति और भुगतान विवरण (Muster Roll & Measurement Book) की गहराई से समीक्षा की जाए।
- कठोरतम कार्रवाई: यदि जांच में अनियमितता सिद्ध होती है, तो बिना किसी राजनीतिक दबाव के दोषी ग्राम प्रधान, रोजगार सेवक और संलिप्त ब्लॉक कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और वित्तीय वसूली की जाए।
यदि समय रहते इस भ्रष्टाचार के कैंसर का इलाज नहीं किया गया, तो यह बीमारी अन्य पंचायतों में भी फैल जाएगी और मनरेगा का मूल उद्देश्य सिर्फ विज्ञापनों तक सिमट कर रह जाएगा। अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है— देखना यह है कि प्रशासन भ्रष्ट तंत्र पर हंटर चलाता है या फिर मामले को फाइलों में दफन कर देता है।






















